गीता पढ़ने के बाद भी इंसान क्यों नहीं बदलता? असली समस्या ज्ञान की नहीं है
गीता पढ़ने के बाद भी इंसान क्यों नहीं बदलता ? असली समस्या ज्ञान की नहीं है कभी गौर किया है ? जिस इंसान ने गीता पढ़ी है , वह भी गुस्सा करता है। उसे भी पैसे की चिंता होती है। उसे भी किसी की सफलता देखकर जलन हो सकती है। वह भी अपमान का जवाब देना चाहता है। और कई बार वह जानता है कि उसे क्या करना चाहिए—फिर भी वही करता है जो नहीं करना चाहिए। तो फिर सवाल थोड़ा असहज है— अगर गीता सच में इतनी गहरी है , तो उसे पढ़ने के बाद हम वैसे ही क्यों रहते हैं ? शायद इसलिए कि हमारी समस्या ज्ञान की कमी नहीं है। समस्या यह है कि हम ज्ञान को अपने ऊपर लागू करने के बजाय कई बार अपने जीवन को सही साबित करने के लिए इस्तेमाल करने लगते हैं। यहीं से असली कहानी शुरू होती है। मान लीजिए किसी व्यक्ति ने गीता पढ़ी है। उसे पता है कि क्रोध बुद्धि को प्रभावित करता है , परिणाम के प्रति अत्यधिक आसक्ति दुख का कारण बन सकती है और इंसान को अपने कर्म पर ध्यान देना चाहिए। लेकिन फिर एक दिन उसने कोई काम शुरू किया। उसने पूरी मेहनत की , उम्मीद भी थी कि परिणाम अच्छा आएगा , लेकिन ऐसा नहीं हुआ। परिणाम उम्मीद के मुताबिक न...